अहिल्या की पुकार

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  2. jagt pati arm .ahilya ki pukar
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Ahalya -Ram . ahilya ki pukar
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अहिल्या की पुकार
हे राम अब तो आओ मैं ,आंसू पी रही हूँ
पाषाण बन गई हूँ ,मर मर के जी रही हूँ
हे राम
नारी हूँ लाज अपनी ,धोखे से खो चुकी हूँ
आकर मुझे उबारो , अपमान पी रही हूँ
हे राम
अपनी ग्रहस्थी में मैं,खुद कांटे बो चुकी हूँ
पश्चाताप की आग में ,अब मैं जल रही हूँ
हे राम
अपने पति की ,नजरो में मैं गिर चुकी हूँ
तेरे दरस की आस में,अब तक जी रही हूँ
हे राम
पतित उद्धरण आ जाओ ,मैं थक चुकी हूँ
आत्मा तो मर चुकी ,फिर भी जी रही हूँ
हे राम
पावन कर देंगे दर्शन, उन से सुन चुकी हूँ
इसी आस में हे राम,सच मानो जी रही हूँ
हे राम
ऋषि विश्वामित्र संग राम, वन आ चुके है
धन्य भाग मेरे उनके, दर्शन पा रही हूँ
हे राम
पतिता उद्धार करने, श्री राम आ चुके है
होकर पवित्र पावन , प्रभु धाम जा रही हूँ
हे राम

जन कवि .गोपाल जी सोलंकी

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  1. अहिल्या की पुकार
    हे राम अब तो आओ मैं ,आंसू पी रही हूँ
    पाषाण बन गई हूँ ,मर मर के जी रही हूँ
    हे राम
    नारी हूँ लाज अपनी ,धोखे से खो चुकी हूँ
    आकर मुझे उबारो , अपमान पी रही हूँ
    हे राम
    अपनी ग्रहस्थी में मैं,खुद कांटे बो चुकी हूँ
    पश्चाताप की आग में ,अब मैं जल रही हूँ
    हे राम
    अपने पति की ,नजरो में मैं गिर चुकी हूँ
    तेरे दरस की आस में,अब तक जी रही हूँ
    हे राम
    ahilya ki pukar
    jan kavi .gopal ji solanki