आखिर हो गए सत्तर पार

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आखिर हो गए सत्तर पार

आखिर हम हो गए सत्तर पार
माया के इस भव सागर में
जीवन भर हिचकोले खाती
डोले ये नैया हमार
आखिर हम हो गए सत्तर पार
सुख और दुःख की धूप छाँव
आगे बढने की ललक कांटो पे
पाँव मानी नहीं हार
आखिर हम हो गए सत्तर पार
तन्हा सफर मिला हम सफर
दोनों समर्पित एक दूजे को
प्यार और सहकार
आखिर हम हो गए सत्तर पार
खिले गुलशन में फूल मनोहर
चंपा चमेली गुलाब मोगरा
महकी उनसे बयार
आखिर हम हो गए सत्तर पार
तन जर्जर मन से शसक्त हम
उम्र का हर पल जीना है
जीवन उसका उपहार
आखिर हम हो गए सत्तर पार
जन कवि .गोपाल जी सोलंकी
काव्य सफर में बढ़ रहे हैं
अब भी लगातार
आखिर हम

जन कवि .गोपाल जी सोलंकी

One Comment

  1. आखिर हम हो गए सत्तर पार
    सुख और दुःख की धूप छाँव
    आगे बढने की ललक कांटो पे
    पाँव मानी नहीं हार
    aakhir ham ho gae sttr par
    jn kavi .gopal ji solanki