आदमी की चादर

  1. gopal ji solanki
  1. gopal ji solanki

 

खीच रहा उपर को चादर सच से रूबरू अब ये होगा |

चादर उसकी छोटी है पांव सिकोड़ के सोना होगा |

खीच रहा उपर …………………………………………………

घर का खर्च चलाने खातिर लम्बी लिस्ट बनाते है |

कुछ जरूरी छूट ना जाए फिर से उसे मिलाते है |

फिर ये जेब चेतावनी देती इसको छोटी करना होगा |

खीच रहा उपर …………………………………………………

पति और पत्नी दोनों बैठे है माथे से माथा टकराए |

बच्चे है इंग्लिस मीडियम में उनकी फ़ीस कंहा से लाए |

पत्नी कहती सुनो जी तुमको ज्यादा मेहनत करना होगा |

खीच रहा उपर ……………………………………………..

घर की जैसी हालत अपने देस की वोही हालत है |

जब लेता वो घुस किसी से भेजता खुद को लानत है |

मंदिर जा के कान पकड़ता दोस् ये इससे कम ना होगा |

खीच रहा उपर ………………………………………………..

भडती हुई मंहगाई ने हम सब को ऐसा निचोड़ा है |

पत्नी और बच्चो के आगे हंमे कही का ना छोड़ा है |

पिक्चर पार्टी स्वप्न हो गए सबर सभी को करना होगा |

खीच रहा उपर ………………………………………………..

इसका कोई तोड़ नही है ऐसा कोई जोड़ नही है |

ये तो रोज की सच्चाई है एक दिन की ये दौड़ नही है |

गोपाल जी ये है वो सच्चाई जिसे मध्यम वर्ग ने है भोगा |

खीच रहा उपर ……………………………………………………..

गोपाल जी सोलंकी

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