ओ बदरा तुम ना बरसे [sukhe khet]

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  2. sukhe khet -kisan . o badra tum na badle [sukhe khet ]
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ओ बदरा तुम ना बरसे [sukhe khet]
ओ बदरा तुम ना बरसे
देख देख सूखे खेतो को
नयना मेरे बरसे
ओ बदरा
छाए तो घन काले काले
गरजे भी घन वो मतवाले
लुप्त हुए बिन बरसे
ओ बदरा
बीत गया आषाढ़ और सावन
भक्ति भरा महिना वो पावन
ना छाए ना बरसे
ओ बदरा
पौधे मरेंगे बीज जरेंगे
सारे घर के सपने मरेंगे
सब सुविधा को तरसे
ओ बदर
खेत ही हैं भगवान हमारे
पेट भरे ये जग का सारे
खुद थाली को तरसे
ओ बदरा
पीढ़ी इसी में खटती आई
खाई है मेहनत की कमाई
बरसे तो मन हरसे
ओ बदरा
आओ कारे बदरा आओ
इन खेतो की प्यास बुझाओ
मन ये मेरा हरसे
ओ बदरा

जन कवि .गोपाल जी सोलंकी

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  1. ओ बदरा तुम ना बरसे [sukhe khet]
    ओ बदरा तुम ना बरसे
    देख देख सूखे खेतो को
    नयना मेरे बरसे
    ओ बदरा
    छाए तो घन काले काले
    गरजे भी घन वो मतवाले
    लुप्त हुए बिन बरसे
    ओ बदरा
    बीत गया आषाढ़ और सावन
    भक्ति भरा महिना वो पावन
    ना छाए ना बरसे
    ओ बदरा
    पौधे मरेंगे बीज जरेंगे
    सारे घर के सपने मरेंगे
    सब सुविधा को तरसे
    ओ बदरा
    o badra tum na barse [sukhe khet]
    jan kavi gopal ji solanki

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