घोल रहे है जहर आज के नेता

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घोल रहे है जहर आज के नेता

घोल रहे है जहर सहिष्णुता
और भाई चारे में
कैसे होगा विकास कहो तो
नफरत के गलियारे में
घोल रहे
कुटिल राजनीति देती अंजाम
छुप कर अंधियारे में
कुर्सी पाने की चाहत उनकी
होती घटना सारे में
घोल रहे
अकुला रहे वे ज्यादा शामिल थे
लूट के वारे न्यारे में
बन सरकार का हिस्सा बहते थे
जो भ्रष्टाचार के धारे में
घोल रहे
देश की अस्मिता सुरक्षा किसी ने
सोचा नहीं इस बारे में
बांटो लूटो राज करो की नीति
ही थी इस सारे में
घोल रहे
आज भी यही षड्यंत्र चल रहा
सत्ता के गलियारे में
अब जनता हुई कुछ जागरूक
समझ रही इस बारे में
किस को चुनकर भेजे संसद में
सजग हुई इस बारे में
घोल रहे
नाउम्मीदी के दौर में सूरज बन
आया वो अंधियारे में
धर्म जांत पांत से उठकर देश ने
कमल खिलाया सारे में
घोल रहे

जन कवि .गोपाल जी सोलंकी

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