चक्र व्यूह रच रहे

  1. desh ke gddar .chkra vyuh rach rahe hain fir se
  2. pappu gaing .chakra vyuh rach rahe hain fir se
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desh ke gadar .chkra vyuh rach rahe hain fir se
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pappu gaing .chakra vyuh rach rahe hain fir se

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चक्र व्यूह रच रहे
चक्र व्यूह रच रहे हैं फिर से
देश बाँटने वाले
कर देंगे हर चाल विफल हम
देश पे मरने वाले
चक्र व्यूह रच रहे
इनको सत्ता से मतलब सब
मंसूबे हैं पाले
एक दूजे के घोर विरोधी मिले
बदल कर पाले
चक्र व्यूह रच रहे
देश की इज्जत से खेलें ये
बुनकर ऐसे जाले
भय का माहौल बना देश में
मतलब अपना निकाले
चक्र व्यूह रच रहे
मासुमो का बलात्कार कर
जिस्म को नोच डाले
न्याय दिलाने के नाम पर
धर्म बीच में डाले
चक्र व्यूह रच रहे
कभी एटी एम् खाली कहते
भ्रम में जन को डाले
देश के दुश्मन शातिर इतने
नित नई तरकीब निकाले
चक्र व्यूह रच रहे
सत्तर साल से बाँट बाँट कर
दिए हैं इतने छाले
हममें घुस कर हमें लड़ाते
बीज जहर का डाले
चक्र व्यूह रच रहे
लगा जागने हिन्दू जबसे
टूटे नफरत के ताले
बढ़ी बेचैनी एक हो गए
मिलकर सांप ये काले
चक्र व्यूह रच रहे
बढ़ा देश का सम्मान तो
जल रहे नाग ये काले
सत्ता पाने के मंसूबों पर
लग ना जाए ताले
चक्र व्यूह रच रहे
सावधान रहकर जनता को
समझनी है सब चालें
कमल खिलाना देश में फिर
कर के विफल सब चालें

जन कवि .गोपाल जी सोलंकी 

One Comment

  1. chkra vyuh rach rahe hain fir se
    हममें घुस कर हमें लड़ाते
    बीज जहर का डाले
    चक्र व्यूह रच रहे
    लगा जागने हिन्दू जबसे
    टूटे नफरत के ताले
    बढ़ी बेचैनी एक हो गए
    मिलकर सांप ये काले
    चक्र व्यूह रच रहे
    बढ़ा देश का सम्मान तो
    जल रहे नाग ये काले
    सत्ता पाने के मंसूबों पर
    लग ना जाए ताले
    चक्र व्यूह रच रहे
    सावधान रहकर जनता को
    समझनी है सब चालें
    कमल खिलाना देश में फिर
    कर के विफल सब चालें
    जन कवि .गोपाल जी सोलंकी
    chkra vyuh rach rahe hain fir se
    jan kavi gopal ji solanki