छोडो अब तो ये पागल पन

छोडो अब तो ये पागल पन
सब मुट्ठी में नहीं आएगा
जिस दिन लौ ये बुझ जाएगी
तन भी जलाया जाएगा
छोडो अब तो
सोना चांदी हीरे मोती
नोटों का अम्बार लगा
बंगला कोठी पद और पावर
जग में भी सम्मान मिला
भटका जीवन भर बाहर ही
खुद से पर ना कभी मिला
यम दरबार में तेरा सारा
करम सुनाया जाएगा
छोडो अब तो
जिस पर इतराता था अब तक
धोया साबुन मल मल कर
सर पे सुगन्धित तेल लगाया
इतराया इत्र की खुशबु पर
रौब था इतना सब झुकते थे
बाँध के दो बांसों में उसे भी
मरघट में जलाया जाएगा
छोडो अब तो
कमा ना पाया दुआ किसी की
किया किसी का नहीं भला
बिगड़ी हुई सन्तान की खातिर
दौलत इतनी छोड़ चला
आज खड़ा है द्वार पे यम के
काम ना आए कोई कला
फेकेंगे खाई में दुखों की
साथ नहीं कुछ जाएगा
छोडो अब तो
करनी का फल पड़े भुगतना
उसे भी ये समझाया गया
डाला गया अनचाहे गर्भ में
कूड़े में फिर फेका गया
अब सडको पर भटक रहा है
कचरा बीनते देखा गया
आदत वही इक्कट्ठा करना
फिर से वही दोहराएगा
छोडो अब तो
पेट का आग बुझाने को वो
ले कबाड़ कांधे पर चला
मिटटी का ये तन है लोगो
पांच तत्व से है ये ढला
देव असुर मानव या योगी
इस माया ने सब को छला
अमर वही होता है जग में
जिसको आए जीने की कला
छोडो अब तो
जन कवि .गोपाल जी सोलंकी

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