तापमान का चढ़ता पारा

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हरा ना पाते गरमी को ✍
तापमान का चढ़ता पारा
झुलसा रहा है जन जन को
सूरज कहर ढा रहा उपर से
जला रहा है तन मन को
तापमान का
कहां गई हरियाली शहर की
आज हरे भरे वे पेड़ कहां है
जिनसे मिलती थी ठंडी छाया
शीतल करती थी आंगन को
तापमान का
चिड़ियों का कलरव खामोश है
चील और कौए नजर ना आते
छीन लिए बसेरे मासूमों के
कोसे बढ़ते शहरी करण को
तापमान का
सुबहा नहाना भारी पड़ रहा है
बिना उबाले जल उबल रहा
नल के आते बिजली गुल होती
भरना पड़ता है गरम जल को
तापमान का
मुंह ढक कर अब घर से निकलते
राहत प्याज आम पना छाछ से
कूलर एसी हर घर मे चल रहे
हरा सकते नहीं पर गरमी को
तापमान का

जन कवि .गोपाल जी सोलंकी

One Comment

  1. tapman ka chadhta para .sara desh suraj bhagvan ke tap se jhulas raha hai
    har tarf trahi trahi machi hui hai para 47. ke as pas chal raha hai jeth ki dupahri me munha dhak kar niklna padta hai umas pasina bechaini abhi kuch din or is se raht ki ummid nahi hai
    jan kavi gopal ji solanki