बाबु मावली प्रसाद [जीवनी]

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बाबु मावली प्रसाद [जीवनी]
बाबु मावली प्रसाद
दो फरवरी १८९४, आप धरा पर आए
छत्तीस गढ़, महतारी के ,गौरव को ,आप बढ़ाए
लड़ने को अज्ञान से ,शिक्षक का पेशा अपनाए
दो फरवरी
माधव राव के अनुज बने ,साहित्य में हाथ बंटाए
कर अनुवाद विरल साहित्य का लोगो तक पहुंचाए
लोकमान्य कृत, गीता रहस्य, चिंतामणी विनायक
महाभारत, अन्य कई कृति अनुवाद में सहयोग लाए
स्वाभिमान में अड़ी नौकरी ,तो उसको ठुकराए
दो फरवरी
साहित्य साधना करते हुए ,विभिन्न पदों को पाए
छत्तीस गढ़ विव्हर्स एसोसिएसन सत्ती बाजार
किशोर पुस्तकालय पुरानी बस्ती रायपुर
शारदा पुस्तक माला जबलपुर
जहां रहे साहित्य की सेवा का वो धर्म निभाए
दो फरवरी
साहित्य की सेवा करते हुए ,सम्मान बहुत वे पाए
छत्तीस गढ़ महतारी के लाडले वे कहलाए
२१ अगस्त १९७४ को चिर निद्रा में समाए
दो फरवरी
ज्योत साहित्य की बुझने ना पाए ,शंकर आगे आए
मिला विरासत में जो खजाना ,जन जन तक पहुंचाए
धन्य हुई छत्तीस गढ़ महतारी ,मावली जी गर्व से मुस्काए
उनका बेटा साहित्य की सेवा का है अलख जगाए
दो फरवरी

जन कवि गोपाल जी सोलंकी

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  1. बाबु मावली प्रसाद
    दो फरवरी १८९४, आप धरा पर आए
    छत्तीस गढ़, महतारी के ,गौरव को ,आप बढ़ाए
    लड़ने को अज्ञान से ,शिक्षक का पेशा अपनाए
    दो फरवरी
    माधव राव के अनुज बने ,साहित्य में हाथ बंटाए
    कर अनुवाद विरल साहित्य का लोगो तक पहुंचाए
    लोकमान्य कृत, गीता रहस्य, चिंतामणी विनायक
    महाभारत, अन्य कई कृति अनुवाद में सहयोग लाए
    स्वाभिमान में अड़ी नौकरी ,तो उसको ठुकराए
    दो फरवरी
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    jan kavi gopal ji solanki