बेशक उम्र हो गई मेरी लेकिन मै

बेशक उम्र हो गई मेरी लेकिन मै कमजोर नही हू
वही हौसला वही दम खम है गुजरा हुआ मै दौर नही हू

हमने भी की थी उम्मीदे बेटा ये अपवाद नही है
होना पाई पूरी इसका हमको पर अवसाद नही है
वही हौशला वही दम खम है अब भी कमजोर नहीं हु
तेरा उतना ही अपना हू मै अब भी कोई गैर नही हूँ
बेशक उम्र हो
इतना स्वार्थ जरूर है मेरा पास में तू और तेरे जाए हों
समझ लिया क्यों बोझ हमे तुम क्यों इतने घबराए हो
जिस छाया में था तू अब तक वो ही हूँ कोई और नहीं हूँ
तेरा उतना ही अपना हूँ मैं अब भी कोई गैर नहीं हूँ
बेशक उम्र हो
बुढ़ा पेड़ भले फल ना दे पर वो छाया तो देता ही है
दो लोटे पानी से ज्यादा वो तुमसे कुछ लेता नही है
सदा दिया ही तुझको अब भी तेरा हूँ और नहीं हूँ
तेरा उतना ही अपना हू मै अब भी कोई गैर नही हू
बेशक उम्र हो
सब सुख मिलता कहां है जितना मिला उसी में खुश हूँ
झुका है सर सिजदे में उसके इतना सब पाकर खुश हूँ
वही हौसला वही दमखम है गुजरा हुआ मैं दौर नहीं हूँ
तेरा उतना ही अपना हूँ मैं अब भी कोई गैर नहीं हूँ
बेशक उम्र हो
जन्म बचपना और जवानी फिर ये बुढापा आता ही है
पहले भी आश्रित था किसी का आश्रित फिर होता ही है
वही हौशला वही दमखम है गुजरा हुआ मैं दौर नहीं हूँ
तेरा उतना ही अपना हूँ मैं अब भी कोई गैर नहीं हूँ
बेशक उम्र हो
समय चक्र चलता ही जाता कम होती जाती आयुस है
जो अपनी सीमा में चलता वो रहता सदा ही खुश है
वही हौसला वही दम खम है गुजर हुआ मै दौर नही हू
तेरा उतना ही अपना हूँ मैं अब भी कोई गैर नहीं हूँ
बेशक उम्र हो
जन कवि. गोपाल जी सोलंकी

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