बोलो कहां से आए तुम

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बोलो कहां से आए तुम
बरसों से इस उजड़े चमन मे ,फिर हरियाली लाए तुम
प्रेम समर्पण की ओ मूरत , बोलो कहां से आए तुम
बोलो कहां से आए तुम
आहत मन पर मरहम रखने ,बोलो कहां से आए तुम
बन कर मेरे इतने अपने ,बोलो कहां से आए तुम
बोलो कहां से आए तुम
टूटे दिल का एक एक टुकड़ा, कितने जतन से उठाए तुम
सब को सही जगह रख जोड़ा ,हुनर कहां ये पाए तुम
बोलो कहां से आए तुम
घोर निरासा के इस बन मे , प्यार अपना बरसाए तुम
तेल था पर बुझ रहा ये दीपक ,लौ को इसकी बढ़ाए तुम
बोलो कहां से आए तुम
तनहाई की सघन रात मे , भोर सुनहरी लाए तुम
मन भौरे को मोहित करने , महक ये कैसी लाए तुम
बोलो कहां से आए तुम
जीने की फिर आस जगा दी ,वो अमृत बन आए तुम
अधरों की फिर प्यास बढ़ा दी, देख के जब मुस्काए तुम
बोलो कहां से आए तुम
जीवन मे जब आ ही गए हो , कभी छोड़ ना जाना तुम
आहत की राहत बन आए , रिस्ता अब ये निभाना तुम

जन कवि .गोपाल जी सोलंकी
30 .6..2017

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  1. बोलो कहां से आए तुम
    बरसों से इस उजड़े चमन मे ,फिर हरियाली लाए तुम
    प्रेम समर्पण की ओ मूरत , बोलो कहां से आए तुम
    बोलो कहां से आए तुम
    आहत मन पर मरहम रखने ,बोलो कहां से आए तुम
    बन कर मेरे इतने अपने ,बोलो कहां से आए तुम
    बोलो कहां से आए तुम
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