मन की आवारगी

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मन की आवारगी
मन की आवारगी पर ,कैसे विराम लगे
दुनिया का आकर्षण, पल पल मन में जगे
मन की आवारगी
शिथिल हो रहे अंग , दम भी फूलने लगे
जीवन की संध्या बेला , फिर भी काम जगे
मन की आवारगी
दर्द कर रहे घुटने पर , चाल में अकड़ लगे
चला चली की बेला पर ना,राम से प्रीत लगे
मन की आवारगी
मैं मेरा के ताने बाने में, सदा रहता ये पगे
बैचैनी से भरा रहे, जब तक ना अर्थी सजे
मन की आवारगी
गीता भगवत धरी घर में,पूजा घर में सजे
जाना बस सत्कर्म संग में,राम को ना भजे
मन की आवारगी
कस लगाम मन के घोड़े की ,हो सवार चले
आगे बढ़ कर प्रभु उसको ,लगाते अपने गले
मन की आवारगी
जन कवि .गोपाल जी सोलंकी

One Comment

  1. मन की आवारगी पर कैसे विराम लगे
    उम्र जैसे जैसे बढती है मानव में अपने तन की रहन सहन की समाज में सम्मान की पैसे की चिंता बढने लगती है वह हर स्तर पर अपने को बेहतर सिद्ध करने की कोशिश करते रहता है पर उम्र पर उसका बस नही चलता शरीर सिथिल होने लगता है बीमारियाँ घरने लगती है धर्म कर्म में उसका मन नहीं लगता जैसे जैसे उम्र बढती है तृष्णा बढती जाती है मन को काबू में कर जो प्रभु शरण जाते है उन्हें शांति मिलती है
    जन कवि .गोपाल जी सोलंकी