ये जहीन मानव

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ये जहीन मानव

ये मानव आज वैसे तो जहीन बन गया
पैसा बनाने की लेकिन मशीन बन गया
ये मानव
मुडकर न देख पाया उड़ा था सबके संग
कोई नहीं अब साथ अकेला रह गया
ये मानव
ये कैसी आपा धापी मिटती नहीं तृष्णा
इछ्छाओ का महज वो दास रह गया
ये मानव
प्रक्रति का दोहन ये करता है क्रूरता से
मानो महज लेना ही काम रह गया
ये मानव
मंसूबे इसके इतने जहरीले हो गए है
अपनी ही साँसों का दुश्मन हो गया
ये मानव
पर्यावरण भी प्रदुसित इतना हो गया है
पेड़ों के संग पक्षियों का वंस खो गया
ये मानव

जन कवि गोपाल जी सोलंकी

One Comment

  1. ये जहीन मानव

    ये मानव आज वैसे तो जहीन बन गया
    पैसा बनाने की लेकिन मशीन बन गया
    ये मानव
    मुडकर न देख पाया उड़ा था सबके संग
    कोई नहीं अब साथ अकेला रह गया
    ये मानव
    ये कैसी आपा धापी मिटती नहीं तृष्णा
    इछ्छाओ का महज वो दास रह गया
    ये मानव
    जन कवि .गोपाल जी सोलंकी