राहे अड़चन

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राहे अड़चन
मंजिल भी सामने थी , और राह भी आसान थी
चल पड़ा बिन सोचे उस पर ,होनी से अनजान मैं
मंजिल भी
दो राहे पर अटक गया ,साथ की आस भटक गया
दूर हुआ उस मंजिल से ,अपनी गलती से आज मैं
मंजिल भी
अच्छा हुआ बड़ों ने रोका ,मृग मरीचिका का धोका
झटका लगा कोमल दिल पर ,सम्भल रहा आज मैं
मंजिल भी
बिछड़ के अपनों से कोई,आज तलक ना सुखी हुआ
उनको दुःख देने चला ,जिनसे हूँ जग में आज मैं
मंजिल भी
माना दिल को चोट लगी ,घाव है हल्के भर जाएंगे
जीते जी मर जाते वे सब ,जिनसे जुड़ा हूँ आज मैं
मंजिल भी
मजबूत पर ना हो पक्षी ,दूर गगन में उड़ना चाहे
बात मान कर अपनों की , हुआ सुरक्षित आज मैं
मंजिल भी
जीवन पथ पर अब सम्भल , कदम मुझको बढ़ाना 
शिक्षित हो और ज्ञानार्जन कर,ले पाऊंगा परवाज मैं
मंजिल भी

जन कवि .गोपाल जी सोलंकी

One Comment

  1. राहे अड़चन
    मंजिल भी सामने थी , और राह भी आसान थी
    चल पड़ा बिन सोचे उस पर ,होनी से अनजान मैं
    मंजिल भी
    दो राहे पर अटक गया ,साथ की आस भटक गया
    दूर हुआ उस मंजिल से ,अपनी गलती से आज मैं
    मंजिल भी
    अच्छा हुआ बड़ों ने रोका ,मृग मरीचिका का धोका
    झटका लगा कोमल दिल पर ,सम्भल रहा आज मैं
    मंजिल भी
    बिछड़ के अपनों से कोई,आज तलक ना सुखी हुआ
    उनको दुःख देने चला ,जिनसे हूँ जग में आज मैं
    मंजिल भी
    jan kavi .gopal ji solanki